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भारतीय साहित्य में प्रेम के अमर ग्रंथ: हृदय की भाषा की तीन सहस्र वर्षीय यात्रा

By admin
Last updated: 07/30/2025
11 Min Read
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भारतीय साहित्य में प्रेम एक अनंत सागर है, जो केवल रोमांटिक भावनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि दार्शनिक गहराई, आध्यात्मिक ऊंचाई और सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक है। भारतीय प्रेम की अवधारणा वेदों से शुरू होकर आधुनिक कविताओं तक फैली है, जहां यह दैवीय (दिव्य प्रेम), मानवीय (रोमांटिक और दांपत्य), वात्सल्य (माता-पिता का प्रेम), भक्ति (भगवान के प्रति समर्पण), सख्य (मित्रता), प्रकृति प्रेम, आत्म प्रेम और विश्व प्रेम के रूप में प्रकट होता है। भारतीय दर्शन में प्रेम रस सिद्धांत का मूल है, जहां भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में ‘शृंगार रस’ प्रेम को सौंदर्य और आनंद से जोड़ता है। भक्ति प्रेम मोक्ष मार्ग है, जो अहंकार का विलयन कर आत्मा को परमात्मा से मिलाता है।

Contents
  • वैदिक काल के प्रेम गीत
  • उपनिषदों में आध्यात्मिक प्रेम
  • महाकाव्यों में प्रेम की गाथाएं
  • कालिदास की प्रेम रचनाएं
  • भक्ति काल की प्रेम धारा
  • संत कवियों के प्रेम दोहे
  • सूफी प्रेम काव्य
  • आधुनिक काल की प्रेम कविता
  • समसामयिक प्रेम साहित्य
  • उपसंहार

यह लेख आपको भारतीय प्रेम साहित्य की समृद्ध यात्रा पर ले जाएगा, वैदिक काल से आधुनिक युग तक। हम देखेंगे कि ऋग्वेद के प्रेम मंत्रों से लेकर अमृता प्रीतम के ‘पिंजर’ तक, प्रेम ने विभिन्न रूप धरे। वैदिक काल में प्रेम प्रकृति और आत्मा से जुड़ा था, महाकाव्यों में मर्यादा और त्याग का प्रतीक बना, कालिदास के काव्य में विरह और मिलन की सुंदरता उभरी, भक्ति काल में दिव्य भक्ति का रूप लिया, सूफी साहित्य में आध्यात्मिक रूपक बना, और आधुनिक युग में सामाजिक जटिलताओं से जूझा।

यह यात्रा भावनात्मक और दार्शनिक है। उपनिषदों में आत्मिक प्रेम मोक्ष का मार्ग है, तो भक्ति साहित्य में यह सामाजिक विद्रोह का माध्यम। आज यह मानसिक स्वास्थ्य, संबंधों और आध्यात्मिकता के लिए प्रासंगिक है। आइए, इस अमर साहित्य की खोज करें, जहां प्रेम हर युग में नया रंग भरता है।


वैदिक काल के प्रेम गीत

भारतीय साहित्य की धारा में प्रेम एक शाश्वत विषय रहा है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक, हमारे महान कवियों और लेखकों ने प्रेम के विविध रूपों को अपनी रचनाओं में अमर कर दिया है। यहाँ उन अनमोल ग्रंथों का वर्णन प्रस्तुत है जिन्होंने भारतीय प्रेम साहित्य की नींव रखी और इसे संसार के समक्ष एक अनुपम खजाने के रूप में प्रस्तुत किया।

ऋग्वेद – सूर्या का विवाह गीत

काल: लगभग 1500-1200 ई.पू.

संसार के सबसे प्राचीन धर्मग्रंथ ऋग्वेद में प्रेम केवल मानवीय भावना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्ति के रूप में चित्रित है। सूर्या-सवित्र विवाह सूक्त (10.85) में दैवीय विवाह का अद्भुत वर्णन है जो आज भी हिंदू विवाहों में गाया जाता है।

मूल श्लोक:

“सूर्या यथैव सवितुर्यथा मनोऽनुरज्यते मनसा पतये पतिः।
एवा त्वं सूर्ये भव सुपत्नी पत्या सह।।”

भावार्थ: जैसे मन सूर्य से जुड़ता है, वैसे ही तुम्हारा मन अपने पति से जुड़े। हे सूर्या! तुम अपने पति के साथ आदर्श पत्नी बनो।

यह मंत्र प्रेम को दैवीय आशीर्वाद और ब्रह्मांडीय सद्भाव के रूप में प्रस्तुत करता है।

अथर्ववेद – प्रेम के जादुई मंत्र

काल: लगभग 1200-1000 ई.पू.

अथर्ववेद में प्रेम की व्यावहारिक अभिव्यक्ति मिलती है। यहाँ प्रेम आकर्षित करने, वैवाहिक सुख प्राप्त करने और हृदयों को जोड़ने के मंत्र हैं।

मूल मंत्र:

“यथा हृदयं तव हृदये मम, तथा मम हृदयं तव हृदये।”

भावार्थ: जैसे तुम्हारा हृदय मेरे हृदय में है, वैसे ही मेरा हृदय तुम्हारे हृदय में निवास करे।

यह मंत्र दो आत्माओं के मिलन की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।


उपनिषदों में आध्यात्मिक प्रेम

बृहदारण्यक उपनिषद – याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी संवाद

काल: लगभग 700 ई.पू.

इस उपनिषद में प्रेम की सबसे गहरी व्याख्या मिलती है। ऋषि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को समझाते हैं कि सच्चा प्रेम आत्मा के लिए होता है, न कि भौतिक वस्तुओं के लिए।

मूल श्लोक:

“न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति।”

भावार्थ: पति अपने लिए प्रिय नहीं है, बल्कि आत्मा के लिए प्रिय है।

यह वाक्य प्रेम को स्वार्थ से परे आत्मिक स्तर तक ले जाता है।


महाकाव्यों में प्रेम की गाथाएं

महाभारत – शकुंतला और नल-दमयंती की कथाएं

काल: लगभग 400 ई.पू. – 400 ई.

महर्षि व्यास के इस विशाल महाकाव्य में अनेक प्रेम कथाएं हैं। शकुंतला-दुष्यंत की कहानी स्मृति और वियोग की पीड़ा को दर्शाती है।

मूल श्लोक:

“न तु शकुन्तला देवी दुष्यन्तं स्मरति क्षणम्।”

भावार्थ: देवी शकुंतला दुष्यंत को एक क्षण भी नहीं भूलती।

यह पंक्ति प्रेम की स्थायी प्रकृति को दिखाती है।

रामायण – राम-सीता का आदर्श प्रेम

काल: लगभग 500 ई.पू. – 100 ई.पू.

महर्षि वाल्मीकि की रामायण में राम-सीता का प्रेम मर्यादा और त्याग से भरा है। यह प्रेम केवल व्यक्तिगत न होकर धर्म और कर्तव्य से जुड़ा हुआ है।

मूल श्लोक:

“सीते, मम प्राणा त्वयि निवसन्ति।”

भावार्थ: हे सीते! मेरे प्राण तुममें बसते हैं।

यह वाक्य समर्पित प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।


कालिदास की प्रेम रचनाएं

अभिज्ञानशाकुन्तलम् – विरह की व्यथा

काल: 4वीं-5वीं शताब्दी ई.

कवि कालिदास का यह नाटक प्रेम, वियोग और पुनर्मिलन की अमर गाथा है। शकुंतला और दुष्यंत के प्रेम में प्रकृति भी सहभागी बनती है।

मूल श्लोक:

“अहो दारुणो विप्रयोगः, येन सहसा हृदयं विदीर्यते।”

भावार्थ: अहा! कितना कष्टकारी है यह वियोग, जो अचानक हृदय को फाड़ देता है।

मेघदूत – प्रेमी का संदेश

यक्ष द्वारा मेघ को अपनी प्रिया के पास संदेश भेजने की यह कथा विरह काव्य की उत्कृष्ट कृति है।

मूल श्लोक:

“काश्चित् कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्तः।”

भावार्थ: कोई व्यक्ति प्रिया के वियोग से व्याकुल होकर अपने कर्तव्यों को भूल जाता है।

कुमारसंभव – शिव-पार्वती का दैवीय प्रेम

इसमें शिव-पार्वती के प्रेम के माध्यम से तपस्या और प्रेम के मेल को दिखाया गया है।

मूल श्लोक:

“उमा तपसा शिवं जिगये।”

भावार्थ: उमा ने तपस्या से शिव को जीत लिया।


भक्ति काल की प्रेम धारा

गीत गोविंद – राधा-कृष्ण का दैवीय प्रेम

रचयिता: जयदेव
काल: 12वीं शताब्दी

इस काव्य में कृष्ण-राधा के प्रेम को दैवीय भक्ति के रूप में चित्रित किया गया है।

मूल श्लोक:

“ललितलवङ्गलतापरिशीलनकोमलमलयसमीरे।”

भावार्थ: कोमल मलय पवन लवंग की लताओं को सहला रही है।

सूरसागर – कृष्ण की बाल लीलाएं

रचयिता: सूरदास
काल: 16वीं शताब्दी

सूरदास के पदों में कृष्ण के प्रति वात्सल्य और मधुर प्रेम की अनुपम अभिव्यक्ति है।

मूल पद:

“मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।”

यह पद बाल सुलभ मासूमियत और मातृ प्रेम को दर्शाता है।

मीरा के पद – विद्रोही प्रेम

रचयिता: मीराबाई
काल: 16वीं शताब्दी

मीरा के पदों में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और सामाजिक बंधनों से मुक्ति की चाह दिखती है।

मूल पद:

“मैं तो गिरिधर के घर जाऊंगी, दुनिया की रीत निभाऊंगी नहीं।”

यह पद प्रेम में समर्पण और विद्रोह दोनों को व्यक्त करता है।

रामचरितमानस – भक्ति और प्रेम का संगम

रचयिता: तुलसीदास
काल: 16वीं शताब्दी

तुलसीदास जी ने राम-सीता के प्रेम को भक्ति के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है।

मूल दोहा:

“जनकसुता जग जननी जानकी, अतिसय प्रिय करुना निधान की।”

भावार्थ: जनक की पुत्री, जगत की माता जानकी, करुणा के भंडार प्रभु की अत्यधिक प्रिय हैं।


संत कवियों के प्रेम दोहे

कबीर के दोहे – निर्गुण प्रेम

काल: 15वीं शताब्दी

कबीर के दोहों में प्रेम को अहंकार के विलय के रूप में दिखाया गया है।

प्रसिद्ध दोहा:

“प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाय।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाय।।”

रहीम के दोहे – व्यावहारिक प्रेम

रचयिता: अब्दुल रहीम खान-ए-खाना
काल: 16वीं शताब्दी

रहीम के दोहों में प्रेम की नाजुकता और उसकी रक्षा का संदेश है।

प्रसिद्ध दोहा:

“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।।”


सूफी प्रेम काव्य

पद्मावत – आध्यात्मिक प्रेम की खोज

रचयिता: मलिक मुहम्मद जायसी
काल: 16वीं शताब्दी

इस महाकाव्य में रत्नसेन और पद्मावती के प्रेम के माध्यम से आत्मा की परमात्मा की खोज को दिखाया गया है।

मूल पंक्ति:

“पदुमावती रूप निहारि, रतनसेन मन हरि लियो।”

भावार्थ: पद्मावती की सुंदरता देखकर रत्नसेन का मन मोहित हो गया।

मधुमालती और मृगावती

रचयिता: मंझन और कुतुबन
काल: 16वीं शताब्दी

ये दोनों काव्य भी सूफी परंपरा में लिखे गए हैं जहाँ प्रेम की खोज वास्तव में ईश्वर की खोज है।


आधुनिक काल की प्रेम कविता

कामायनी – मानवीय प्रेम का दर्शन

रचयिता: जयशंकर प्रसाद
काल: 1936

इस महाकाव्य में मनु और श्रद्धा के प्रेम के माध्यम से बुद्धि और भावना के संघर्ष को दिखाया गया है।

मूल पंक्ति:

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत पग तल में।”

निराला की ‘सरोज स्मृति’ – पिता का प्रेम

रचयिता: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
काल: 1937

अपनी पुत्री सरोज की स्मृति में लिखी यह कविता पिता के प्रेम की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

महादेवी वर्मा – रहस्यवादी प्रेम

छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा की कविताओं में प्रेम रहस्यमय और आध्यात्मिक रूप में प्रकट होता है।

मूल पंक्ति:

“मैं नीर भरी दुख की बदली, फिरती हूँ तेरे आकाश में।”

हरिवंश राय बच्चन – जीवन प्रेमी कविता

बच्चन जी की कविताओं में जीवन और प्रेम का उत्सव दिखता है।

प्रसिद्ध पंक्ति:

“इस पार, प्रिये, मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा।”


समसामयिक प्रेम साहित्य

अमृता प्रीतम का ‘पिंजर’

काल: 1950

विभाजन की त्रासदी के बीच प्रेम, दर्द और मानवता की यह कहानी आधुनिक हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।


उपसंहार

भारतीय प्रेम साहित्य की यह समृद्ध परंपरा दिखाती है कि प्रेम केवल व्यक्तिगत भावना नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। वैदिक काल से आधुनिक युग तक हमारे कवियों ने प्रेम के अनगिनत रूपों को अपनी लेखनी से अमर बनाया है। ये ग्रंथ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि मानवीय भावनाओं की गहराई को समझने का भी साधन हैं।

प्रेम की यह शाश्वत धारा भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जो युगों से हमारे हृदयों में प्रवाहित होती रही है और सदैव प्रवाहित होती रहेगी।

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